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13 Feb 2017 · 1 min read

यह रिश्ते

एक रिश्ते को सँभालने में
इंसान खुद अपना रिश्ता
भूल जाता है

माँ को संभाले
या अपने पिता का
फिर बीवी का
या अपने बच्चों का

वो क्या करे
क्या न करे
क्या वजूद रह जाता है
क्या उस को भाता है

बड़ी उलझन है
नहीं बाकि कोई
रहती समझ्न है
बेकार हो जाता है

बेचारा कुछ नहीं कर पाता है
इस को वो समझते
समझते, बस दुनिया से
सोचता , चला जाता है !!

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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