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12 Feb 2017 · 1 min read

वोह समय कहाँ से लायूं मैं....

कैसे भुलायूं,कैसे बुलायूं
वोह समय कहाँ से लायूं मैं
वोह दादी की कहानी
इक राजा इक रानी
वोह नानी की ज़ुबानी
मछली जल की थी रानी
वोह बच्चों की टोली
मेरे हमजोली
वोह साथी कैसे भुलायूं मैं
वोह समय कहाँ से लायूं मैं

वोह गलियों की खेलें
वोह छुपा-छुपाई
वोह मिट्टी में लतपथ
कपड़ों की धुलाई
वोह अपनों की पीठ पर
घोड़े की सवारी
कंधों पे बैठ कर
चड़ती थी जो ख़ुमारी
अब हर कोई है व्यस्त
सैल-फ़ोन में मस्त
वोह कंधा कहाँ से लायूं मैं
अब घोड़ी किसे बनायूं मैं
वोह समय कहाँ से लायूं मैं

वोह सायें काल में
वोह दीपक का जलाना
वोह धूप जला के
वोह सीस झुकाना
फिर चटाई बिछा के
ज़मीन पे बैठ जाना
लबों से अपने
ईश्वर का नाम दोहराना
अब लैप टोप की आरती
टी.वी के दर्शन
वोह मंज़र कैसे बनायूं मैं
वोह समय कहाँ से लायूं मैं
हर कोई है व्यस्त
सैल-फ़ोन में मस्त
किसे भुलायूं , किसे बुलायूं
अब किस को पास बिठायूं मैं
वोह समय कहाँ से लायूं मैं
– राजेश्वर
(कपूरथला)

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