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11 Feb 2017 · 1 min read

II इंसान की फितरत II

इंसान होकर भी बेजुबा हो गए सभी l
खामोशियों से बोलना आदत बनी रही ll

ऐसा नहीं कि हम को कोई मलाल है l
मिटती नहीं मिटाने से हसरत बनी रही ll

ऐसा नहीं कि दर्द भी होता नहीं हमें l
बिन बोले ना बताने की फितरत बनी रहीll

अच्छा कहेगा मुझको जब अच्छा उसे कहूं l
लेने देने की उसकी तो आदत बनी रही ll

शेरों को मापना हो तो हो जाओ बदगुमां l
तारीफ जो अदब की इमारत बनी रही ll

मेरी ग़ज़ल जमीर मेरा मेरी बात है l
तारीफ ना हो कोई इबादत बनी रही ll

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश l

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