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10 Feb 2017 · 1 min read

II तीर शब्दों के बना.... II

तीर शब्दों के बना कर , लेखनी में धार कर l
चल उठा अपनी कलम तू, जंग का आगाज कर ll

देश-दुनिया सब कलंकित, भ्रष्टता अभिशाप है l
गूंजे जग में ,कर दे हलचल ,ऐसे तू हुंकार कर ll

खाने से मरते कहीं पर ,हो रहे फाके यहां l
मन जो कलुषित ,राख कर दे ,शब्दों को अंगार कर ll

लुट रही जो डोलियां, पग-पग पे कुचला मान है l
सो चुका राणा का पौरुष, रक्त में संचार कर ll

खुब बनाती जो सियासत, हिंदू -मुस्लिम भेदकरl
भेद सारे खोलने को, वेद तू तैयार कर ll

शब्द गीता और आयत, यीशु का आधार है l
तीखे करके आज इसको, शब्द भेदी वार कर ll

इस धरा पर आज भी, गंगा भगीरथ ला रहे l
सारे भेदों को भुलाकर ,कर्म का सम्मान कर ll

लिखने को तो है बहुत, पर कुछ मेरी मजबूरियां l
साथ सब को ले के चलना, और सबको प्यार कर ll

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश l

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