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10 Feb 2017 · 1 min read

II...अंदाज निराले है II

वो डूबती कश्ती है कुछ दूर किनारे हैं l
हालात बदलने के अंदाज निराले है ll

मैं खुद हि लिपट रोया अपनी नफासत से l
है कौन जो ए समझे क्या जख्म पुराने हैं ll

शब्दों से हुआ सजदा लहराते तिरंगे को l
शासक जो यहां बदले उससे भि सयाने है ll

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश l

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