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10 Feb 2017 · 1 min read

II क्या करूं II

मैं रहा सुर ताल में ,थी भीड़ ज्यादा क्या करूं l
बे सुरों से सुर मिलाना, ही न आया क्या करूं ll

आ गया था मैं भी तेरे, दर पे मजमा देख कर l
सिर झुकाना ही न आया, पढ़ के कलमा क्या करूं ll

हो सके तो माफ कर दे, जिंदगी मेरी मुझे l
मैं निकल मजबूरियों से, चल न पाया क्या करूं ll

गैर से शिकवा न कोई, मेरे अपने भी कभी l
राह मेरी चल न पाए, आज दुनिया क्या करूं ll

दौलतों की थी कमी, जो गर्दिशों का साथ था l
प्यार से की परवरिश, जीवन लुटाया क्या करूं ll

अब “सलिल” मुमकिन नहीं, यह सफर आगे बढ़े l
भोर की पहली किरण, सपना बिखरता क्या करूं ll

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश l

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