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9 Feb 2017 · 1 min read

II चांद को भी मालूम II

चांद को भी मालूम, कि चाहता, है उसे कोई चकोर l
बीते तभी तो, रात सुहानी, बांधे नैनों की डोर ll
चांद को भी मालूम ……..

वह भी दूरी ,सह ना पाए ,करे भी क्या कुछ ,कर ना पाए l
उसके आंसू, सुबह मिलेंगे, हर तिनके की पोर ll
चांद को भी मालूम …..

धरती से सदा, दूर गगन है, दूर नदिया के ,दोनो किनारे l
ए दुनिया के, ऐसे बंधन, टूटे ना ,लगाओ कितने जोर ll
चांद को भी मालूम……….

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश l

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