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9 Feb 2017 · 1 min read

तुम जीवन सार हो

जब तुम्हारा विहग मन उड़ जायेगा
प्रेम तरुवर की मधुरतम छाँव को
कामनाओं का बड़ा उद्यान बनकर
बाँध लूँगा मैं तुम्हारे पांव को

ज्यों भटकते अक्षरों को जोड़कर
शब्द बनता है कोई सार्थक
भावनाओं की जमीं पर रोपकर
पा सकोगे ताल सुरलय की खनक

तुम भटकती चाँदनी में तैरती
पूर्णमासी की सुनहरी रात हो
तुम सरोवर की सतह पर बिछ रहे
कमल दल पर हो रही बरसात हो

तुम मेरा अस्तित्व, कविता, प्यार हो
तुम छलकते नेह का आधार हो
देह नस में दौड़ता संचार हो
प्राण – प्रिय ! तुम, जीवन सार हो

प्रदीप तिवारी ‘धवल’

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