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9 Feb 2017 · 1 min read

ग़ज़ल

तुम जो सीने लगो यार मज़ा आ जाये।
आओ कुछ ऐसे करें प्यार मज़ा आ जाये।

मैं ने मुद्दत से नहीं देखा सुहाना मंज़र।
तेरा हो जाए जो दीदार मज़ा आ जाये।

ज़िन्दगी भर की शराबों का उतर जाए नशा।
ऐसी होंटो से पिला यार मज़ा आ जाए।

आबले तुझ को दुआ देंगे मेरे पैरो के।
इतने रस्ते में बिछा ख़ार मज़ा आ जाए।

मेरी आँखों को बरसने का कोई मौका दे।
दर्द वो दिल को दे इक बार मज़ा आ जाए।

बोझ साँसों का उठा कर मैं फिरूँगा कब तक।
खुद से हो जाऊं जो बेज़ार मज़ा आ जाए।

आज होने दे मेरी जान मिलन रूहों का।
तोड़ दे जिस्म की दीवार मज़ा आ जाए।

अपनी आँखों से मचा दे मेरे अंदर हलचल।
छेड़ यूँ दिल के मेरे तार मज़ा आ जाए।

ओढ़ कर तुझ को रज़ाई की तरह सर्दी में।
कर लूँ साँसे को जो अंगार मज़ा आ जाए।

सुबह सुबह तेरे हाथों से बनी चाए के साथ।
पढ़ने मिल जाए जो अख़बार मज़ा आ जाए।

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