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8 Feb 2017 · 1 min read

मैं कितना दूर आ चुका हूँ।

वो झरने की झर झर
नदियों की कल कल
झील औऱ सागर की लहरें
वो बारिश की रिमझिम
खेत खलियानों की किलकारियां
बागों में वो बहारें
फूल पत्तों की कलाकारियां
वो पनघट औऱ रहट की चीखें
आसमान मे कांव कांव
वो पीपल के छाव से
आज मैं कितना दूर आ चुका हूँ।

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