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8 Feb 2017 · 1 min read

चाहत बहुत है।

बन गई है ये चाह्त दुसमन हमारी अब तुम्हे चाहने की चाहत बहुत है,
भुलाने की आदत तुम्हारी थी पागल याद आने की फितरत हमारी बहुत है,
सुबह जो कभी साथ ये साँस छोड़े पर क्या तुम्हे छोड़ने की आदत बहुत है,
गमो की थी बस्ती दुखो को जलाया उजाला किया हर खुसी को राख कर के ,
वो आये कमजर्फ मुस्करा के बोले तुम्हारे आसियाने में अंधेरा बहुत है ,
जमाने की फितरत और तेरी बेवफाई थोड़ा दर्द मेरा जिस में ज़माने की खुसी थी समायी ,
फिर लगी आग ऐसी जिगर को जलाने ,
वो छुड़ा हाथ दूर जा कर के बोले तुम्हे दर्द सहने की आदत बहुत है ,
उतारा नकाब जो हमने आशिकी का खुला राज़ फिर उसकी दिल्लगी का ,
कसम खायी जाना इस जमाने में धोखे बहुत है ,
बन गयी है ये चाहत दुसमन हमारी अब तुम्हे चाहने की चाहत बहुत है ।

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