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7 Feb 2017 · 1 min read

मुक्तक

शामों-सहर तेरा क्यों ख्वाब देखता हूँ?
दर्द का ख्यालों में आदाब देखता हूँ!
अजनबी सी बन गयी हैं मंजिलें लेकिन,
रंग ख्वाहिशों का बेहिसाब देखता हूँ!

#महादेव_की_कविताऐं’ (23)

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