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6 Feb 2017 · 1 min read

अकेले ही चले जाना है

इक सफ़ेद चादर ओढ़ के जाना है
उस खूबसूरत से चेहरे को उसमें छूपाना है
शमशान तक सब को यहाँ बस आना है
आगे की मंजिल को खुद हमने ही पाना है !!

दाग जितने भी हों उस चादर पर
मिटाके जहान से चले जाना है
कहने वाले न जाने क्या क्या कह देंगे
हम को तो जीते जी…..साथ निभाना है !!

चेहरे को देख कर परिवार चूम देगा
सारे अरमानो को छोड़ वो अकेला चल देगा
साथी रह जायेंगे , कारवाँ बिछड़ जायेगा
खुदा का बुलावा कब आये….हंस के वो उठाना है !!

अच्छा था चला गया, मुझे तंग करता था
अच्छा हुआ, ..नाश हुआ इसका,.. न जाने
किस किस को हँसता, किस किस को रोता
छोड़ के हम को,.. तो इस जहाँ से चले जाना है !!

अजीत तलवार
मेरठ

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