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3 Feb 2017 · 1 min read

दहेज़ की अग्नि में स्वाह....

हीना का रंग अभी तक हाथो पर जवां था….
माथे पर बिखरा सिन्दूर हर लम्हे का गवाह था….
सिलवटे बिस्तर पर अभी भी ले रही थी करवटे…
कमरे की खामोशियाँ कर रही थी आहटे…
दरो-दीवारों का सूनापन उसकी सिसकियो का गवाह था….
हीना का रंग अभी तक हाथो पर जवां था….
मां की भीगी आंखे, कर रही थी बयां…
ममता के जज्बात को, सिमटी हुई थी ज़िन्दगी जिसमे,
हर उस बात को….
पिता की कांपती उंगलिया, दिल में दे रही थी दस्तके…
तय करवाए थे जिनसे न जाने कितने ही रास्ते…
नन्हे कदमो के गवाह, रो रहे थे हर वो रास्ते…
भाई की कलाई पे बंधा था धागा,
चुरा रहा था वो नजरे जिस से….
आँखों से बहता हर आंसू उसकी लाचारी का गवाह था…
हीना का रंग अभी तक हाथो पर जवां था….
दरो-दीवारों का सूनापन उसकी सिसकियो का गवाह था….
हीना का रंग अभी तक हाथो पर जवां था….

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