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3 Feb 2017 · 1 min read

" ऐसी गई ठगी , कानों सुनी न - अधर धरी "

एहसासों की चौखट पर ,
मन का नर्तन !
मधुर कल्पनाओं का नित ,
होता रहा सृजन !
पवन झरोखों की थपकी पर ,
खोई सुध री !!

सुधियों के दरवाजे पर ,
दस्तक दे दी !
उम्मीदें सब ऐसे ही ,
परवान चढ़ी !
छुअन जगाती रही रात भर ,
अनुभूति पसरी !!

चाहत की दरकार अभी ,
सच कायम है !
पलकों पर के ख़्वाब सभी ,
ताज़ा दम हैं !
बदले बदले से बस तुम हो ,
मैं चकित , ठहरी !!

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