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3 Feb 2017 · 1 min read

ए मन मेरा हुआ चंचल

ए मन मेरा हुआ चंचल न जाने क्यों बहकता है l
मेरे घर के रहा जो सामने छत पर टहलता है ll

समा है चांदनी रातों का उसपर मेघ काले हैं l
हवाएं चल रही हैं जोर पल्लू भी सकता है ll

नहीं उसको पता कुछ भी मेरी अपनी जो हालत है l
मेरा मन मोर है व्याकुल यह मौसम भी समझता है ll

हवा का साथ ना देना लटों का पीछे ही रहना l
कदम तो आगे बढ़ते हैं लगे मन पीछे रहता है ll

रहा जो दिल में ही अपने उसे अब ढूंढना कैसा l
करूं मैं बंद जब आंखें वो मेरे दिल में रहता है ll

नहीं भूला अभी तक तिरछी नजरों देखना उसका l
हुई मुद्दत गए उसको “सलिल”अब तक महकता है ll

संजय सिंह “सलिल”
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश l

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