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2 Feb 2017 · 1 min read

अध्यात्म विमुख होता जग

“एक दुविधा सी मन में उठती है
दिल असमंजस से भर जाता है
ज्ञान की डोली में जब कोई
विद्या की अर्थी छोड़ जाता है ,
करके शिक्षा का उद्यमीकरण
जब ज्ञान को दबाया जाता है
चढ़के दर्शन की बलि वेदी पर
उच्छृंखलता को अपनाया जाता है ,
पैरों में पहनने वाले जूते जब
शोरूमों में सज शान बढ़ाते है
जीवन की आधार शीला शिक्षा
जब फुटपाथों पे बेचे जाते है ,
विश्वविजयी जो बनना है तो
शस्त्र,शास्त्र को अपनाना होगा
हुए अगर जो वंचित इनसे
तो इतिहास को फिर दुहराना होगा ||”

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