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2 Feb 2017 · 1 min read

ज़िंदगी की दौड़

ज़िंदगी बढ़ रही
आगे-आगे , आगे -आगे,
मैं इसके ही पीछे
दौड़ रहा भागे-भागे,भागे-भागे।
पर पकड़ न पाता,
क्योंकि कभी रफ़्तार,
इसकी होती तेज़ और कभी
दिखता ही नहीं रास्ता।
पर लुत्फ़ उठा रहा इस दौड़ का
क्योंकि ज़िन्दगी का आकर्षण
मुझे खींचता है अपनी ओर ,
रखता है मुझे गतिमान निरंतर।
पर इस अनवरत गति से,
कई बार महसूस करता हूँ थकन,
तो कई बार होता है चुभन,
ज़िंदगी को पूरा न पाने का।
कई बार अनजान आकृति ,
मेरे पाँव में डाल अदृश्य बेड़ियाँ,
रखना चाहती हैं मुझे स्थिर,
पहुँच न पाऊँ अपने गंतव्य तक।
वहीं कुछ लोग बढ़ाते ही हैं
मेरी गति को,
बनाते हैं मेरी मति को
लक्ष्य के अनुकूल ,
जिससे मैं सहजता से ही
पा ही लूँ अपने लक्ष्य को।
गति और ठहराव,
इन दो ध्रुवों
के बीच ही
जूझती है यात्रा।
गति देता है
जीवन को विकास
पर ठहराव
देता ही है ह्रास।
लेकिन गति के लिए
ठहराव भी ज़रूरी है,
इससे मिलता है अवकाश
जिससे संचित कर सकें
नवीन ऊर्जा भी
आगे की यात्रा के लिए।
हमारा ये जीवन
कठिन यात्राओं से ही बुना है,
गर जो हुआ विचलित कठिनाइयों से,
उसका जीवन उपलब्धियों से सूना है,
पर जो निर्द्वंद भाव से रहा गतिमान,
उसको मिलता कई गुना है।

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