Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
1 Feb 2017 · 1 min read

रंग बसंती जब खिलते हैं

रंग बसंती जब खिलते हैं
नैनों से सपने झरते हैं

कूक रही कुंजन कोयलिया
पान पराग भ्रमर करते हैं

शीत लहर से पा छुटकारा
खिले खिले से मन हँसते हैं

कली महकती हवा बहकती
गीत मधुर कवि मन रचते हैं

दुल्हन रुप धरा धरती ने
पिया मिलन तन मन चलते हैं

वन उपवन आँगन यूँ महके
मन का सारा दुख हरते है

मात !’अर्चना’ पूजन करके
हम अपना मंगल करते हैं

डॉ अर्चना गुप्ता

Loading...