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30 Jan 2017 · 1 min read

अबकी बसंत

आई बसंत की बेला.
नभ उपवन में छाई मेला.
अमीया पर मंजर ले लाई.
पपीहा संग मधुर पवन बहाई.
रोम – रोम पुलकित हो जाती.
सरसों की बाली जब लहराती.

क्यों मौन हुए जाते शरद.
हवाओं की तरह बहक जाते शरद.
बसंत उमंग संग फाग बहावे.
होरी ठिठोली संग स्वांग रचावे.
रोम – रोम पुलकित हो जाती.
सरसों की बाली जब लहराती.

अईहे बरस साजन हमरे.
रंग में नया उमंग रचईहे.
मयूर नाची कोयल गाई.
बसंत पवन संग बादल छाई.
रोम – रोम पुलकित हो जाती.
सरसों की बाली जब लहराती.

अवधेश कुमार राय…..

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