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28 Jan 2017 · 2 min read

सर्द अँधेरी रात

सन्नाटे को चीरती
हमारी मोटरसाईकिल
जब हाईवे पे
बाकी वाहनों को
मात दे
रात की कालिमा को
अपनी तेज रफ्तार से
चिढा रही थी….
सर्द चीरती हवा
हमारे ओवरकोट को
ललकारती
कलेजे के पार
चली जा रही थी …
शहर के फुटपाथ पे एक
भिखारन बैठी
चार बच्चों संग
ठंड से बेखबर
चिथड़ों से अपनी
असमत बचा रही थी……
अपने फ्लेट के अन्दर
बैठी मेमसाहब
अपने पालतू
रॅाकी को
प्यार से
स्वेटर पहना रही थी …….
कलयुगी
सभ्य समाज में देखो
हाय रे
इन्सानी कीमत
जानवर से भी कम
आंकी जा रही थी …..
वही दुर कहीं
बड़े से बंगलें में
मेकअप चढाई
अधेड़ महिला
बुढे रामु काका पे
शब्दबाण बरसा रही थी….
कहीं नन्हा रामू
किचन में कांपता
बरतनों की
जूठन के संग
अपनी रूठी किस्मत
मना रहा था …..
वहीं मेमसाहब का
जिद्दी लड़का
पढाई छोड़
दोस्तों संग
खुलकर
ठहाके लगा रहा था …..
सुदूर झोपडी की बाला
टिमटिमाते तारे
जगमगाते जुगनू
बुझते दिये
के संग
गीत कोई
गुनगुना रही थी
मेरे देश की धरती
सोना उगले….
दूर बीयर बार में
बैठे कुछ शौकीन
बार बाला
के संग
म्यूजिक का लुत्फ
उठा रहे थे…..
सामने चौराहे
संतो के
सतसंग में बैठ
कुछ अधेड़
भगवत महिमा
गा रहे थे ……
सुदूर ग्रामीण
बच्चों का झुंड
थककर
अपने अपने
कस्बे में
अलाव जला
आग तपा रहे थे …..
टेरिस पर
कोट पहने
किटि में
व्यस्त चीनू
कन्सेप्ट केअनुसार
गेम खिला रही थी ……
वहीं घर के किसी
कमरे में
शीला दीदी
बीमार माँ को
खाना खिला रही थी…..
मफलर जैकेट
पहने कांपता
सुरक्षाकर्मी
मेन गेट पे
आगन्तुकों को
सैल्युट करे जा रहा था …..
नदी पार
मरघट में
कुछ भीड़
डुबे गम में
खो स्वजन
राम नाम
की सत्यता
समझा रही थी …..
पास ही
एक महिला
प्रसव वेदना
के उपरांत
नवजात शिशु पा
अत्यंत हर्षा रही थी …..
स्वाधीन हैं आज हम
करोड़ों लोगों की
जानें लेकिन
गरीबी और भुखमरी
से जा रही थी…..
सरिता खोवाला अग्रवाल

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