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25 Jan 2017 · 1 min read

वक़्त-बेवक़्त तू याद आने लगा है...

छाने लगा फिर है, ख्वाहिशों का मौसम
सरूर मुहब्बत का, सताने लगा है !
आलम क्या बताऊँ, दिल का मैं तुझको
वक़्त-बेवक़्त तू याद आने लगा है !!

सपनों का आशियां, है फिर से सजाया 
बेवक़्त बारिशों का डर सताने लगा है!
ये सपने – ये रिश्ते, कहीं टूट न जाएँ
इस डर से ही दिल घबराने लगा है !!

मुझे देख कर, वो तेरा मुस्कुराना,
तेरे जाने के बाद, याद आने लगा है !
छुपे से हैं अहसास, कहीं खुल न जाएँ
“दिल” राज़ खुद अपने से छुपाने लगा है !!

छाने लगा फिर है, ख्वाहिशों का मौसम
सरूर मुहब्बत का, सताने लगा है !
आलम क्या बताऊँ, दिल का मैं तुझको
वक़्त-बेवक़्त तू याद आने लगा है !!

अंजु गुप्ता

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