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23 Jan 2017 · 1 min read

मैं

हर लम्हा
पुकारती हूं
मैं..
हर लम्हा
हारती हूं
मैं..
समझ न आये
मायने अब तक
बस लम्हे
संवारती हूं
मैं…
इक तमाशा
बन गई
ज़िंदगी
बस जीकर
गुज़ारती हूं
मैं…..
न कोई राह
न कोई मंज़िल
न कोई आवाज़
न परवाज़
अजब सा
ये मंज़र
है आंखो में
जाने क्या
तलाशती हूं
मैं…….

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