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23 Jan 2017 · 1 min read

मकड़ी-सा जाला बुनता है

मकड़ी-सा जाला बुनता है
ये इश्क़ तुम्हारा कैसा है

ऐसे तो न थे हालात कभी
क्यों ग़म से कलेजा फटता है

मैं शुक्रगुज़ार तुम्हारा हूँ
मेरा दर्द तुम्हें भी दिखता है

चारों तरफ़ तसव्वुर में भी
इक सन्नाटा-सा पसरा है

करता हूँ खुद से ही बातें
कोई हम सा तन्हा देखा है

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