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23 Jan 2017 · 1 min read

तुम मेरी कविता

तुम मेरी कविता
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जब मन का तालाब
दर्द की बारिश में सराबोर हो कर
रिसता रहता है आँसू बन कर,
हर बूँद में ढल कर
नमकीन अहसास लिए तुम आती हो।

और जब कँकर फेंक फेंक कर
बार बार पानी में शून्य बनाता हूँ
और उन शून्य के घेरों में
खोजता रहता हूँ अपनी छवि।
उस काँपते तस्वीर में उभर कर फिर
नया विश्वास लिए तुम आती हो।

या जब नदी के बाँध
लगातार समय के थपेड़ों से
लड़ लड़ कर, थक कर
जवाब देने लगते हैं;
उस उफान में उबल कर
या बवन्डर के मंथन में मथ कर
मिट्टी का आभास लिए तुम आती हो।

आती हो तुम उस चाँदनी रात को
जब चाँद का प्यार
बिखर रहा था अंतरिक्ष के पार,
और जब छोटे घने बादल
टूट पड़ते हैं उस चाँद पर
उस मासूम खरगोश पर जैसे
झपट पड़े थे गिद्धों के झुंड।

या जब कोई ख्वाहिश की मौत पर
चुल्लु भर पानी में
खुदकुशी को आतुर जिन्दगी
साहस के चप्पू तेजी से चलाती है
और एक किनारा बन कर
मसीहा की तरह तुम आती हो।

और जब विरह के समंदर के किनारे
यादों की लहरों से कबड्डी खेल कर
गीली रेत में सपनों का घर बना
इंतजार करता रहता है मन,
नये ऋँगार लिए फिर तुम आती हो।

और तुम आती हो जब,
सजता संवरता हूँ मैं खूब:
भावों में नहा कर,
अलंकारों से ऋंगार कर,
रेशम के छँद पहन,
समर्पन से तिलक करता हूँ,
तुम्हारा, तुम मेरी कविता।

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