Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
21 Jan 2017 · 1 min read

एक सूरज उगा रहा हूँ मैं

मुश्किलें हैं, मिटा रहा हूँ मैं ।
एक सूरज उगा रहा हूँ मैं ।।

गर्म आहें घुटन सिसकते पल ।
इन फिजाओं से दूर कुछ बेकल ।
लौट कर जल्द आ रहा हूँ मैं ….
एक सूरज……..।।

स्वप्न टूटे पड़े हुए तो भी ,
क्रूर पत्थर खड़े हुए तो भी ।
काँच के घर सजा रहा हूँ मैं…….
एक सूरज…….।।

रात के इन घने अँधेरों में ,
चन्द जुगनू लिए बसेरों में ।
चाँद तारे उगा रहा हूँ मैं……
एक सूरज……..।।

दर्द जितने मिले मुझे देना ।
आँसुओं के सिले मुझे देना ।
बेंचने प्यार आ रहा हूँ मैं….
एक सूरज……….।।

खुशबुएँ और तितलियों के पर ।
धूप के, छाँव के, हवा के घर ।
एक दुनिया बना रहा हूँ मैं……
एक सूरज………….।।

बुझ गए जो, उन्ही उजालों से ।
और उलझे हुए सवालों से ।
एक चिनगी उठा रहा हूँ मैं….
एक सूरज………….।।

राहुल द्विवेदी ‘स्मित’
लखनऊ
7499776241

Loading...