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20 Jan 2017 · 1 min read

मुक्तक

बुढ़ापे में जो नज़र कमज़ोर हो गई
अफ़सोष सब की नीगह पलट गई
हर चीज़ पुछता हूं,उलझी सी नज़र
उजली सहर जैसे अंधेरी रात हो गई

सजन

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