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19 Jan 2017 · 1 min read

बदलाव चाहिये

बदलाव चाहिये

सुबह की चाय
हाथ मे अखवार
वही खबर
लूटमार
बलात्कार
भ्रस्टाचार
पढ़ते पढ़ते
चाय ठंडाई
छाई मलाई
अंतरमन मे
अफसोष करते
सरकार को गरियाते
व्यवस्था की दुहाई देते
अपनी सीमा बताते
और निश्चुप हो जाते
आवाज लगाई
चाय ठंडी हो गई
विवेक जैसे
धुल जम गई
मरकर ठंडा हो गया
अन्दर से
हम सिर्फ सहते
प्रतिवादी नहीं बनते
लो फिर आई चाय गरम
पर नहीं आती शरम
व्यवस्था हम से
व्यवस्था से नहीं हम
कब टूटेगा भ्रम
आज का अखवार
कल होगा पुराना
खबर नहीं बदलेगी
बदलेगा पात्र और स्थान,
जब तक नहीं बदलेगा जमाना

सजन

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