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18 Jan 2017 · 1 min read

"विरह"

मेरी कलम लिख रही, “विरह” मधुमास का,

मन मुरझाया, खिला फूल जब अमलतास का,

चली जब बसंती पवन,पलाशों सा मन दहका,

गमगीन कोयल भी गाये गीत मेरे विरह का ,

भवरें सी तान में खुले बंध कोपल कलियों का,

धड़कन में बजता गीत जैसे मन की हसरत का,

सासों में बजे लय घुंघरू सा खनकते दिल का ,

मन में घुटती आहें छेड़े राग जल-चातक का ,

फ़ागुन में बरसा जैसे लहू-रंग मेरे अरमानो का,

कसमसाने लगा मन सर्द हवा में ज़र्द पत्तों का,

विरह की गर्मी से झुलस गये पंख तितलीयों का,

खोजे मन वावरा रिमझिम सा मिलन सावन का !

सजन

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