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16 Jan 2017 · 2 min read

"बेटी बोझ नही..."

मेरी यह कविता उन माता – पिता के लिये एक संदेश जो बेटीयों को बोझ समझतें हैं और उसके जन्म से पहले ही उसे कोख मे ही मार देतें हैं या बेटी को बोझ समझ कर नाली या गटर मे फेंक देतें है.।

“बेटी बोझ नही…”

माँ पुछ रही एक बेटी तुझसे…।

न खोली थी आंखें मैने,
ना ही था मैने इस दुनिया को देखा…!!

क्या गलती थी मेरी इसमे…।
और क्या थी बता खता मेरी..।
कि एक बेटी बनाकर भेजा
ईश्वर ने कोख मे मुझे तेरी..।

पुछ रही एक बेटी तुझसे…।

जीने से पहले ही बेटी का तुमने.,
मौत से रिस्ता क्योंं जोड़ दिया..?
जन्म लेते ही मरने के लिए बेटी को,
क्यों कूड़े कचड़े पे तुमने छोड़ दिया!!

जब चाह ही नही थी बेटी की तुझको,
कोख मे ही अपनी क्यूं नही मार दिया..!!

जन्म देकर क्यो गटर मे फेंकां
क्यूं मां की ममता को शर्मशार किया..!!!

माँ पुछ रही एक बेटी तुझसे…।

बेटी होना तो इस दुनिया मे,
है कोई तो पाप नही..!

बेटे से बढकर हो सकती है बेटी,
वो कोई श्राप नही..!!

सोच तु भी तो एक बेटी ही है…।
फ़िर मुझ बेटी से इतनी नफ़रत क्यों..!!

जब जन्म नही दे सकती एक बेटी को तो,
औरत होने का तुझको गफ्लत क्यों..!!

माँ आ तेरी बेटी तुझे पुकार रही है…।
दबि दबि कदमों से मौत मेरी ओर आ रही है.।

बोझ समझकर जिस बेटी को तुमने,
जन्म लेते ही जीवन से निकाला है..!!!

मां देख तेरी वो बेटी आज बनी,
कई कुत्तों का निवाला है..!!

ये कुत्ते मुझे नोच रहें है..!!

ताजा मांस मिला खाने को,
आज यही सोच रहें है..!!

माँ पुछ रही एक बेटी तुझसे…।

जब रख नही सकती जिन्दा तुम एक बेटी को..!
सोचो कैसे न करे ये दुनिया तुम पर शक नही…!!

बेटी होकर भी इक बेटी को मारा तुमने.।
माँ कहलाने का तुम्हे कोई हक नही…!!

माँ कहलाने का तुम्हे कोई हक नही..!!

विनोद कुमार “सुदामा”

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