Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
13 Jan 2017 · 1 min read

पट समय के खोलने दो

पट समय के खोलने दो
********************
दीप बनकर जलने दो
रोशनियों को रंग लेने दो
इंतहा हुई कैद की अब
खुलकर अब हँस लेने दो

राग जो भूले हुए थे
ताल से भटके हुए थे
भूलकर अब खलिश को
गीत वो गा लेने दो

रंग उतरा है चुनर का
फीका सब ढंग घर का
लूटकर रंगरेज के रंग
स्वप्न अब रंग लेने दो

घुट रही हैं जो हवाएँ
बंद दरवाजों के अंदर
है निशा अब जा चुकी
पट समय के खोलने दो ।

इला सिंह
************

Loading...