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11 Jan 2017 · 1 min read

बेटियों की हाय (कविता)

बेटिओंकी हाय (कविता)

सितम से हार कर जब,

लब हो जाते हैं खामोशें।

अपने हक केलिए लड़ते हुए’

जब ख़त्म हो जाये जोश ।

जब टूट जाती है शैतानो की सीमायें ।
और वह गुरुर में अंधे होजाएं.

ज़ुल्म के नशे में चूर हो जायें ।

पागल हो जायें .

तब ! हाँ तब !

लेती है कुदरत अंगड़ाई ।

एक कयामत उभरती है.

सब तरफ बर्बादी देती है दिखाई ।

तब यह ख़ामोशी, यह आह,

तूफान बनकर टूटती है ।

बरसों से दबी ,कुचली हुई ताक़त,

ज़लज़लों से झूझती है ।

साथ जो मिल जाय एक बार समय का,

उसके तो फिर कहने ही क्या!

करवट बदल ले वोह बस एक बार!

तो रावण भी क्या !

उखाड़ सकती है पाप की जड़ को.

एक मजबूर, मजलूम और मासूम की हाय ,

क्या रंग लाती है ?

जब कहकशां टूट कर शैतानो पर गिरती है ।

तो यह जानलो ताक़त वालो!,

ज़ुल्म की भी सीमा होती हैें।

जब जोश में आती है कुदरत ,
और रंग लाती है बेटियों की हाय ।

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