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10 Jan 2017 · 1 min read

बढे शहर की ओर अब (दोहे )

बढे शहर की ओर अब,पढ़े लिखों के पाँव !
सूना सूना हो गया ,..प्यारा अपना गाँव !!

रहा नहीं वो गाँव अब , रहे नहीं वे लोग !
मित्र आज देहात को, लगा शहर का रोग !!

नहीं बेचना भूलकर,अपने सिर की छाँव ।
पड जाये कब लौटना, महानगर से गाँव! !
रमेश शर्मा.

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