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10 Jan 2017 · 1 min read

ग़ज़ल

बखेडा वतन को मिटाता रहा है
जमाना यहाँ घर बसाता रहा है |

यही है फ़साना यही है वो’ झगडा
सदा दुश्मनी क्यों निभाता रहा है |

पुराना चलन है जहां बेरहम में
धनी मुफलिसों को सताता रहा है |

गरीबी में’ सपना अधूरा ही’ रहता
वही ख़्वाब क्यों फिर सजाता रहा है |

जलाकर कुटी को हवेली बनाना
अमीरों की फ़ितरत बताता रहा है |

गगन भेदी’ निर्माण सब है तो’ सुन्दर
कुटी की खिल्ली उडाता रहा है |

© कालीपद ‘प्रसाद’

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