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9 Jan 2017 · 1 min read

इंसान

इंसान
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तैर – तैर बुलबुलों सा उठता
हर बार ही वजूद खो देता
आशा तृष्णा के मेघों सा उठता
जमीं पर बादल बन बरसता

स्फुरित स्फुटंन भावों का
वेगों से तोड़ मेड़े निकल पड़ा
मन में छुपे बैठे जो शब्द
नाद लहरियाँ बन के निकलता

ख्यावों के लिहाफ खुलते
हरेक ख्याल मचल गरमाता
अन्तस की चीत्कारें चीखें
वजूद अपना समझाने लगता

काँच जैसी पारदर्शी जो दिखता
आर -पार स्वच्छ मृदु सा लगता
जड़े विकसित जो पाक खून से
छल कपट दम्भ सहन न करता

उठती तरंगे सहारा ढूढाँ करती
सागर समझे उनकी वेदना
पाती जब मौन निमन्त्रण उसका
जाकर अपना अर्पण करती

जीवन का मायाजाल भी ऐसा
मन फँस जाता पंतगे जैसा
आत्मबल मोह का देखो जरा
खींचता जाता वशीभूत हो ऐसे

हर शख्स सोचें हर रोज यहाँ
कम नहीं मैं खुदा से यहाँ
तभी बाज न आता अपनी से
समझे खुद को खुदा यहाँ

डॉ मधु त्रिवेदी

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