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6 Jan 2017 · 1 min read

गरीबी

जिस तरह शाख से
टूटकर पेड़ की पाती
समय के साथ सूख जाती है
नाव कैसी भी हो मगर
नाविक पथ भूले तो
मंझधार में डूब जाती है

गरीबो के हितैषी आपको
गली छोड़कर मिल जायेंगे
उम्मीद की उन आँखों से
पूछो कभी खेलने वालो
भरे सावन में अक्सर आंखे
गरीब की सूख जाती है

बांटते समाज को नित
जाति, पाखंड और धर्मो में
अमीरी कसर नहीं छोडती
आदतन गरीबी को डसने में
अपने मन को टटोलकर देखो
गरीबी की बात करने वाले”बनारसी”
यह जो राह हम सब ने चुनी है
आखिर वह किस तरफ जाती है

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