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6 Jan 2017 · 1 min read

दर्द-ए-ग़म

दर्द-ए-ग़म =
लेखिका- श्रीमति अलका जैन, रानीपुर झांसी

1, गर रोने से दर्दो ग़म का
मिटना मुमकिन होता!
तो दुखियों के अश्कों में
जमाना बह गया होता !

2, न खुशी की सराय है कोई
न ही सुकून-ए-डेरा है!
दिल की शाख पे बस
दर्दों ग़म का बसेरा है !

3, फकत इक दर्द से तुम
इतने मायूस हो गये,
बेहिसाब दर्द सहकर भी
देखो मुस्कुरा रहे है हम !

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