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2 Jan 2017 · 1 min read

बेटियाँ - एक कविता / गीत

बेटियाँ – एक कविता / गीत

मैना जैसी – होती है बेटी
बोली से ही – मन हर लेती है
घर आँगन – फुदक फुदक कर
हर किसी को – भाने लगती है

बिन बेटी – कोई घर कहाँ
मन भावन – कहला पाता है
जैसे बिन – फूलों की बगिया
क्या गुलशन भी – हो सकती है

बेटियाँ तो – होती एक दौलत
जो न कभी – खतम होती है
आँगन खेत – महकने लगते
बेटी के कदम – पड़ते ही

और ये दिखते – सूने सब हैं
बिन बेटी जब – ये रह जाते
बेटी आँगन की – रौनक होती
जैसे हो – फूलों की वेणी
माँ, बाबा, बाबूजी कह वो
सारे दुख ही – हैं हर लेती

नाम भी रौशन – करती बेटियाँ
देश नहीं – दुनियाँ भर मेँ भी
गर्व से मन – है भर भर जाता
जब जीत लातीं – पदक बेटियाँ

और कभी तो – ये ले आतीं
स्वर्ण पदक भी – विश्व मंच से
अपने ही – देश की बेटियाँ
तब पूरा देश – कर उठता
जय जय कार – इन बेटियों की
ऐसी कुछ – होती हैं बेटियाँ

कितने होते – वो लोग अभागे
जो नहीं चाहते – आयें बेटियों
आगे बढ़ वो – छू लें आकाश
देश दुनिया – कर सके गर्व
ऐसी हों कुछ – अपनी बेटियाँ।
Ravindra K Kapoor

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