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1 Jan 2017 · 1 min read

***** ०००० मुक्तक ०००० *****

1. हिंदी से ही शान,
हिंदी से ही मान,
हिंदी से हमारी,
दुनिया में पहचान|

2. बचपन खेल खेल में बीता,
जवानी मौज से जीता,
बुढ़ापा देख वो हर पल’,
किसी को दुःख न देता |

3. वाणी में मिसरी घुल जाये,
जो भी सुने वही हर्षाये,
हर कोई चाहे सुनना औ,
सुनने को तरसे – ललचाये |

@ कवि कपिल खंडेलवाल “कपिल”
सर्वाधिकार सुरक्षित
कोटा (राजस्थान)
मो न 92514-27109
ई मेल – skkhandelwal1981@gmail.com

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