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30 Dec 2016 · 2 min read

डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' की कुछ रचनाएँ.

कुण्डलिया
000
जागो प्रियवर मीत रे ,कहे सुनहरी भोर.
चलना है गर आपको , सुखद लक्ष्य की ओर.
सुखद लक्ष्य की ओर ,बढेगें अगर नही हम.
विपदा होय अभेद्य ,न कभी खतम होंगे गम.
कहें ‘सहज’ कविराय , रुको मत भागो प्रियवर.
है लम्बित अभियान , अभी तो जागो प्रियवर
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मुक्तक द्वय
000
1
सर्दी से सर्द, कुहासे का खंजर.
बड़ी सावधानी, ज़ोखिम का मंजर.
गरीबी -अमीरी, व छोटे -बड़े का,
दिखता ऐसे में, बड़ा सारा अंतर.
000
2.
अखबार में दिखता न, समाचार आज कल.
संसार में दिखता न, सदाचार आज कल.
न्यूज़ हर होती नहीं है, व्यूज से सज्जित,
खबरें तो बढ़ाती हैं, अनाचार आज कल.
000
मोदक छंद (वार्णिक- मात्र भार-12)
मापनी – 211 211 211 211
मोदक छन्द: (नव मुक्तक )
०००
ध्यान धरें अब, ध्यान धरें हम
ग्यान भरें अब , ग्यान भरें हम
शान रहे अब ,शान्त रहे जग
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तेवरी
000
आज का राजनेता
अमीरों को ही सदा देता
गरीबों से ही छीन लेता, परंपरा इस देश की .
जो आदर्शवादी
है बहुत मोह माया वादी
जुबान से मानवतावादी,परंपरा इस देश की.
धांधली चहुँ ओर है
अन्धकार है प्राणि मात्र पै
नेताओं की है बस जै,परंपरा इस देश में.
गरीब का इम्तिहान
अमीर ही कहलाए महान
पूजें उसको ही सभी लोग, परंपरा इस देश की.
‘सहज’ का है मानना
असल किसी को है न जानना
दुर्दिन में नहीं पहिचानना,परंपरा इस देश की.
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अंतर्ध्वनि : गीतिका:
000
ख़ुशी देख मेरी, वे सब जल रहे हैं.
फँसे जाल में वे ,हम यूँ खल रहे हैं.
नहीं जानते वे,कि कल क्या है होना,
इसी से बरफ में, वे खुद गल रहे हैं.
कहीं देर होने पे,सब लुट न जाए,
जली पे हमारी, नमक दल रहे हैं.’
ज़मीं-आसमां पर,है कब्ज़ा उन्हीं का,’
दुखी आत्मा को, यूँ ही छल रहे हैं.’
‘सहज’ की नवाज़िस,निखालिश है यारो,
समाधान यूँ ही, लंबित चल रहे हैं.
@डॉ.रघुनाथ मिश्र ‘सहज’
अधिवक्ता/साहित्यकार
सर्वाधिकार सुरक्षित

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