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25 Dec 2016 · 3 min read

किन्नर ......माँ के नाम एक पाती , जो लिखी है रह जाती

माँ के नाम एक पाती , जो लिखी है रह जाती
किन्नर ……
कहते हैं मनुष्य गलतियों का पुतला है.यह सार्वविदित व स्वीकार्य भी है ,किंतु ईश्वर ! क्या ईश्वर भी गलती कर सकते हैं .84 लाख योनियों में सर्व सुंदर रचना इंसान हैं और इंसानों में स्त्री – पुरूष एक दूसरे के पूरक हैं ,पर “किन्नर” शब्द मानों कोई श्राप सा प्रतीत होता है. कहते हैं भगवान हम सब के साथ हमेशा नहीं रह सकते इसलिये ” माँ ” को बनाया. माँ अर्थात ममता की मूर्त .पर जब एक माँ किसी समान्य बालक को जन्म न देकर किसी किन्नर को जन्म देती है तो शा्यद ममता के स्थान पर सिर्फ ” मूर्त ” रह ज़ाती है – एक पत्थर की मूर्त .जो अपने कलेजे के टुकडे को गुमनामी के अन्धेरे में भटकने के लिये छोड देती है
लेकिन किसके डर से ? मैने तो बुजरगो से सुना है के – सिर्फ ईश्वर से डरो .पर हम समाज से डरते हैं ,वो समाज जो हमसे ही बना है .मैं शायद उस माँ की व्यथा की कल्पना भी न कर पाऊँ पर एक किन्नर की व्यथा को अपनी कुछ पंक्ततियो द्वारा आपके समक्ष रखने का थोड़ा सा प्रयास किया है

न नर हूँ ,न नारी हूँ ,न ही माँ किसी की और न बाप हूँ
हूँ ईश्वर की एक विकृत रचना या खुद के लिये ही श्राप हूँ .

न आगमन हुआ मेरा अम्बर से न उपजी मैं धरा से
कोई तो होगा पिता ?मेरा भी जन्म हुआ होगा किसी माँ से

कैसे और किसे बताऊँ ,ए माँ कैसे बीत रहा जीवन मेरा
एक बोझ सा है जीवन और भीड में भी हूँ मैं तनहां
य़ादों में एक घर तो है पर है वो धुंदला सा
तेरे आँचल की लोरी,पापा का दुलार
भाई – बहन से लडना- झगडना व रूठना मनाना
सब लगता है सपना अधुरा सा
हाँ ! पता है कारण भी इसका ए माँ
क्योंकी न मैं थी स्त्री पूरी_था पुरूष भी अधुरा सा
क्यों जीवन लगा मेरा ही दाव पर
हर रोज रिस्ते हैं ज़खम मेरे ,पर रखता नहीं मरहम कोई घाव पर
कौन हैं ज़िम्मेदार !!! माता पिता या समाज ???
कहीं मैने खुद ही तो कुलहाङी नहीं दे मारी अपने ही पांव पर

बदलकर अपना लिबास लगाकर माथे पर लाल चान्द बदल ली है अपनी पहचान खुद ,सिरे से अंत तक
पर जो न बदली ,वो है तेरी य़ाद आज तक

माँ! बचपन के खिलोने तो हकीकत बन गए, पर
मेरे सपने हकीकत में न जाने क्या बन गए ?
औरों के जलसों को रोशन हूँ करता ,पर पता है माँ
बस अंधेरा है मुझे अपना सा लगता
क्योंकी वो हमेशा मेरे गम छिपा जाता है
बस इसलिये मुझे अब अंधेरा भाता है
तेरी तरह वो समाज से भी नहीं डरता
जो हमेशा है मेरे साथ रहा करता

पता है माँ-
बस य़ादों का बिछोंना लिये सो जाता हूँ
सच सच बता माँ क्या मैं भी तुझे य़ाद आता हूँ ?

मुझे तो तेरे बिछौह की घडियां रोज मारती हैं
लेकिन सांस न चाहकर भी चलती रहती है
तेरी लोरी व फटकार की य़ाद नींद चुरा ज़ाती है
दिखा कर धुन्दली सी तस्वीर मुझे,मेरी अांख भिगा ज़ाती है
पर फिर भी मैं ज़िन्दा हूँ ! हाँ ज़िन्दा हूँ –
एक चलती लाश की तरह क्योंकी
मेरी साथी है बस और बस मेरी विरह

नीलम शर्मा

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