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17 Dec 2016 · 1 min read

सपनों की गठरी

खुद को मैं खुद में
खोज रहा हूँ आजकल
मालूम हुआ कि मुझमें
मैं बाकी हूँ अभी…..
बैठकर अकेला
सोचता हूँ अतीत को…
और बह निकलता है इक
आँसूओं का सैलाब
जो भिगो देता है…
मेरे टूटे हुए सपनों को..
और फिर झपक जाती हैं
वो गीली आँखे
नये सपने
बुनने के लिए…!
फिर मैं निकल पड़ता हूँ..
भोर होते ही घर से
अपने सपनों की
गठरी बाँधे….
और बेदर्द दुपहरी में
तपाता हूँ तन को
बस इसी विश्वास के साथ
कि इन सपनों को यकीनन
हकीकत नसीब होगी…..

-पवन जयपुरी

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