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12 Dec 2016 · 1 min read

सजा

खुद के लिए खुद सजा मुकर्रर की
शादी तो की मैंने,नौकरी भी की|

निकली थी आसमां की तलाश में,
जमीं भी पर पैरों तले न रही|

इक अनुभवी ने कहा था कभी
दो नावों पे सवारी न होती सही|

पर मैं तो महिला हूँ आधुनिक
महामहिला बनने सो,मैं थी चली|

पर जिन्दगी’एकता’का सीरियल नहीं,
जो कर ले पार’प्रेरणा’हर’कसौटी’|

घर भी संभला हुआ,दफ्तर भी सही,
पर ‘मैं’ हूँ कहाँ? ढूँढ़ती फिर रही|

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