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12 Dec 2016 · 1 min read

??अपना- अपना नज़रिया??

दिल दिया जिसको,हो गया रक़ीब।
वो राजदां था दिल के बहुत क़रीब।।

बिस्मिल किया दिल,क़समें-वादे तोड़।
अर्श से गिरा ज़मीं पर मेरा नशीब।।

कौन जाने किसी को आज़माए बिन।
अमीर भी होते हैं, दिल से ग़रीब।।

ख़ुश है दीवाना बन,चाँद का चकोर।
बेचारा न जाने,है कितना बदनशीब।।

आँखों में प्यार का समन्दर लिए हुए।
मिला था हमको भी बेवफ़ा अज़ीब।।

कर्मे-सिला है नेकी और रुसवाई,बंधु।
ख़ुदा खैर करे,भटके हैं जो अजीज।।

“प्रीतम”चाँद को देखे कोई दाग़ को।
अपना-अपना नज़रिया सबका साहिब!

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