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11 Dec 2016 · 1 min read

ना इत्तेफ़ाक़ कोई ना कोई क़हर चाहिये

ना इत्तेफ़ाक़ कोई ना कोई क़हर चाहिये
नींद टूटे वो रु-ब-रु हों ऐसी सहर चाहिये

कायनात को समझ पाउँ गीतांजली पढ़ के
इक बार टेगौर का वो मुझको शहर चाहिये

उठे हैं जज़्बात यूँ तो दिल में कैसे -कैसे
मेरी ग़ज़ल मुकम्मल कर दे वो बहर चाहिये

नुमायां है उसका नूर यूँ तो हर इंसान में
हो रोशन इंसानियत वो महर चाहिये

एक नहीं सौ बार मुझ ही पर बिजलियाँ गिरा
मगर ए आसमाँ राहतों के कुछ पहर चाहिये

बहुत सताती है मुझे आ -आकर ख़यालों में
तेरी यादों को मिटा डाले वो ज़हर चाहिये

निकल आएँगे मोती ‘सरु’ उसके दिल से कभी
ख्वाबों के समंदर में मुसलसल लहर चाहिये

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