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11 Dec 2016 · 1 min read

उसकी मासूमियत को हम आँखों से पढ़ लेते हैं

हमने खुद ही उन्हें हमसे खफ़ा होने की वजह दे दी,
कि गुस्से में उनके चेहरे की खूबसूरती बढ़ जाती है।

रूठना मनाना न हो तो जैसे, मन में उमंग नहीं उठती,
नाराज़गियों से गुज़रकर ही नज़दीकियाँ बढ़ जाती हैं।

उनकी मायूसियों को हम आँखों से पढ़ लेते है,
वैसे हमसे छुपाने को वो, कितनी ही कहानियाँ गढ़ जाती है।

————-शैंकी भाटिया
अक्टूबर 2, 2016

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