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11 Dec 2016 · 1 min read

जख्म दिल का भला कैसे छिपाया होगा

जख्म दिल का भला कैसे छिपाया होगा
उभरकर सामने ही दर्द जब आया होगा

दास्तां बेवफ़ाई की सुन उस सितमगर की
अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा

लट उलझी सी चेहरे पर जब बिखरी होगी
किस कदर दिवानों का दिल जलाया होगा

नज़र आपकी तरफ भी तो उठी ही होगी
जब किसी क़ातिल का नाम आया होगा

जी न सकेंगे सनम तेरे बिन पल भर भी
न पूछो के मैने ये रैन कैसे बिताया होगा

याद नहीं है मुफ़लिसी किसी को भी मेरी
बड़ी मुश्किल से ये मंजिल को पाया होगा

मिलती रही है सजा कँवल को किस जुर्म की
दिल किसी का तो उसने नहीं दुखाया होगा

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