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9 Dec 2016 · 1 min read

खंड खंड मैं-अखण्ड तुम

।।खंड-खंड मैं,अखण्ड “तुम”।।

खंड खंड होता है इंसान
संपूर्ण तो सिर्फ़ भगवान
खंड खंड क्यों न फिर जीता
हर रिश्ते में क्यों वो रीता?
काल-खंड भी खंड खंड
ईनाम इक तो दूजा दंड
सुख संपूर्ण न संपूर्ण दुःख
होता कहाँ है कोई जीवन
खंड खंड ये मानव गर
जी ले जीवन भी खंड खंड
हो अद्भुत असीम फिर
वस्ले यार उस “अखण्ड” ।।

**शुचि(भवि)**

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