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8 Dec 2016 · 1 min read

खुले आसमाँ तले सोया भी जाय तो कैसे..

खुले आसमाँ तले सोया भी जाय तो कैसे
बोलो मच्छरों का पहरा भी जाय तो कैसे

बड़े शहर के छोटे घर में बंद से कमरे में
ए.सी के बिना बोलो ठहरा भी जाय तो कैसे

खेलते थे मिल-जुल के मोहल्ले के बच्चे
कंप्यूटर के बिना खेला भी जाय तो कैसे

फ़ेसबुक से यारी है क्या रिश्तेदारी है
बेबाक़ लोगों को टोका भी जाय तो कैसे

गमलों में लगाये पौधे भी सूख गये हैं घर-घर
इस तरह प्रदूषण को रोका भी जाय तो कैसे

दवाएं दो- चार तो रोज़ लेता है हर शख़्स
बीमारी का आलम देखा भी जाय तो कैसे

वो और ज़माने थे ‘सरु’पैदल चलते था आदमी
दिल्ली को मेट्रो के बिना सोचा भी जाय तो कैसे

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