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5 Dec 2016 · 4 min read

जहर

?जहर(एक लघु कथा)?
“मनु और मीनू! यहाँ आओ बेटा जल्दी से भगवान जी का प्रसाद ले लो|” “नहीं माँ,मुझे नहीं खाना” नन्हा मनु मुँह बिगाड़ता हुआ बोला”और मुझे भी नहीं खाना मेरा अभी मन नहीं कर रहा है|”कहते हुए मीनू ने भी अपनी बात जोड़ी|संस्कारी राधा को अपने बच्चों का प्रसाद के लिए इस तरह मना करना बड़ा अटपटा लगा उसने प्रसाद की थाली मेज पर रखी और दोनों बच्चों को प्यार से अपने पास बुलाकर समझाया” देखो बच्चों कभी भी प्रसाद के लिए मना नहीं करते|प्रसाद में भगवान का आशीर्वाद होता है| चाहे थोड़ा-सा ही खाओ,पर माथे से लगाकर भगवान का धन्यवाद करना न भूलो|” बच्चे माँ को बहुत ध्यान से सुन रहे थे इसलिए बालमन पर और गहरी छाप छोड़ने के लिए माँ ने जोर देकर कहा,” जब हम भगवान का प्रसाद खाते हैं तो वह हमसे बहुत खुश होते हैं और हम जो भी चाहते है वह हमें तुरन्त मिल जाता है|हमें कभी प्रसाद का अनादर नहीं करना चाहिए, वरना भगवान हमसे नाराज हो जाते हैं” “अच्छा माँ,ऐसी बात है तो आप मुझे जल्दी से प्रसाद दे दो|मैं तो जरूर प्रसाद खाऊँगी और कभी प्रसाद के लिए मना नहीं करूँगी” बड़ी मीनू ने यह कहकर अपने को समझदार दिखाया तो छोटे मियाँ मनु भी कहाँ पीछे रहते उन्होंने भी झट माँ से प्रसाद माँग लिया और प्रसाद बँधी अंजुलि को माथे से लगाकर माँ को आँखों की कोर से देखा|माँ बड़ी खुश हुई आखिर उसने अपने छोटे छोटे से बच्चों को एक अच्छी आदत सीखा दी थी|
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राधा बरामदे में बैठी अखबार पढ़ रही थी| अखबार पढ़ते पढ़ते अचानक उसके चेहरे पर बेचैनी के भाव आने लगे|वह बेसब्री से पृष्ठ पलटने लगी और फिर गौर से कुछ पढ़ने लगी पर यह क्या उसके चेहरे पर घबराहट के भाव बढ़ते ही जा रहे थे|उसने अचानक से अखबार को बंद करके मेज पर पटका और टीवी ऑन कर लिया|रिमोट से न्यूज चैनल सैट कर के वह सोफे पर पसर गयी|शहर में जहरखुरानों का गिरोह सक्रिय होने की खबर चल रही थी,कैसे कुछ दिनों से कई बच्चे इस गिरोह ने अपहृत कर लिये थे,कई बुजुर्गों को भी निशाना बनाया गया था|कुछ पीड़ित जो समय रहते अपनों के पास पहुँच गये या जो भाग्य से बच गये,उनका इंटरव्यू चैनल पर बार बार प्रसारित किया जा रहा था|एक पीड़ित बुजुर्ग बता रहीं थी,” अरे भगवान कैसा जमाना आ गया है|तिलक लगाये बाबा जी थे वे तो|बोले थे बेटा लो मैय्या का प्रसाद खाओ,तुम्हारे सब दुःख दूर हो जायेंगे| बेटा रिक्शा लेने गया था मैंने प्रसाद माथे से लगा थोड़ा सा मुँह पर रखा भर था पर जब होश आया तो यहाँ अस्पताल में आँख खुली|”बेटा बता रहा था,”जब मैं रिक्शा लेकर लौटा तो माँ पेड़ के सहारे बेसुध पड़ी थी|पैसों का पर्स गायब था,नाक,कान,गले और हाथ के जेवर गायब थे|पर माँ मिल गयी यही बहुत है वरना हमारे पड़ोसी का तो नौ साल का बेटा नहीं मिल रहा जो उसी रास्ते से गुजरता था|उस महिला का रो रो कर बुरा हाल था जिसका बेटा अपहृत हुआ था|राधा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी टीवी देखकर तो उसका मन और भी भारी हो गया था,आँसू आखों के कोने पर छलकने को तैयार बैठे थे|राधा ने नजर घड़ी की ओर दौड़ायी तो उसका दिल धक-सा कर गया|इस समय तक तो उसके बच्चे घर आ जाते थे|पता नहीं कैसे कैसे ख्याल उसके दिल में आने लगे|उसने आनन फानन घर बंद किया,चप्पलें पहनी और बाहर गली का रुख किया ही था कि नन्हें मनु और मीनू की चहकती आवाजें सुनायी दी|जैसे प्राण लौट आयें हो,बदहवास सी राधा ने दोनों बच्चों को गले से लगाकर बेतहाशा चूमना शुरू कर दिया|बच्चे अवाक् से माँ को निहार रहे थे|कुछ देर बाद बड़ी मीनू बोली,”क्या हुआ माँ?”माँ जैसे होश में आयी और बच्चों को प्यार से देखती हुई बोली,”कहाँ रह गये थे तुम दोनों आज?कितनी देर लगा दी|”मनु उछल कर बोला,”माँ,मीनू दीदी गन्दी है|रास्ते में एक बाबाजी मिले थे,वो प्रसाद बाँट रहे थे|पर दीदी ने प्रसाद खाने नहीं दिया|आप ने बताया था न कि प्रसाद को कभी मना नहीं करते फिर भी|है न दीदी गन्दी,आप इनको डाँटना |हाँ|” राधा ने किंकर्तव्यविमूढ़ होकर मीनू की ओर देखा|अब मीनू की बारी थी,” माँ जब हम स्कूल से आ रहे थे तो मनु का जूता खुल गया था और इसने लैस बाँधने की कोशिश की थी जब इससे लैस नहीं बँधी तो मैंने इसकी लैस बाँधी थी तो हम दोनों के हाथ गंदे थे फिर हम जूतों वाले गंदे हाथों से प्रसाद कैसे खाते?इसलिए मैंने बाबा जी से प्रसाद लेकर बैग में रख लिया अब हम हाथ धोकर प्रसाद खा लेंगे मैंने ठीक किया न माँ?”हाँ बेटा बिल्कुल ठीक किया|”राधा इससे अधिक कुछ न कह सकी|उसे यकीन नहीं हो पा रहा था कि उसकी एक सीख ने उसकी दूसरी सीख को निष्प्रभावी कर आज उसके कलेजे के टुकड़ों को सही सलामत उसके सामने ला दिया|अचानक राधा ने मीनू का बैग खोलकर प्रसाद का दोना निकाला और नाली में फैंक दिया|नन्हा मनु चिल्लाया,”अरे माँ आपने भगवान का प्रसाद नाली में फैंक दिया भगवान नाराज होंगे अब” राधा दोनों बच्चों को पहलू मे समेटते हुए बोली,”नहीं होंगे|ये प्रसाद नहीं जहर है|” बच्चे कुछ नहीं समझ पा रहे थे प्रसाद आखिर जहर कैसे हो गया|
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लेखिका हेमा तिवारी भट्ट
बैंक कालोनी,खुशहालपुर
मुरादाबाद (उ.प्र.)

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